सहजावस्था का अर्थ है वह स्थिति जो हमारे अस्तित्व का मूल स्वभाव है। किंतु आध्यात्मिक मार्ग पर एक गहरा विरोधाभास सदैव मुमुक्षुओं को चकित करता रहा है—जो ‘सहज’ (Natural) है, वह ‘दुर्लभ’ (Rare) कैसे हो सकता है? यह लेख इसी गहन सत्य की परतों को उघाड़ने का एक विनम्र प्रयास है।
महोपनिषद का संकेत: क्या सरलता ही सबसे बड़ी चुनौती है?
महोपनिषद का एक अत्यंत प्रभावशाली श्लोक इस आध्यात्मिक यात्रा के द्वंद्व को स्पष्ट करता है:
“दुर्लभो विषय त्यागो, दुर्लभं तत्त्वदर्शनम्, दुर्लभा सहजावस्था, सद्गुरुकरुणां विना।”
इसका अर्थ है कि इंद्रियों के विषयों का त्याग दुर्लभ है, आत्म-तत्व का दर्शन दुर्लभ है और सहजावस्था तो और भी अधिक दुर्लभ है; और यह सब सद्गुरु की करुणा के बिना संभव नहीं। यहाँ प्रश्न उठता है कि जो अवस्था हमारे साथ ही जन्मी है, जो श्वास लेने जैसी नैसर्गिक होनी चाहिए, उसे प्राप्त करना इतना कठिन क्यों है? क्या मुक्ति वास्तव में कोई दुर्गम शिखर है, या हमारी बुद्धि का जटिल ढाँचा ही उसे ओझल कर देता है?
सहज का वास्तविक मर्म: वह सरलता जो श्वास से भी सुलभ है
‘सहज’ का अर्थ है—वह जो आपके साथ ही उत्पन्न हुआ है। यह कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे भविष्य में कहीं से अर्जित करना है। स्रोत संदर्भों के अनुसार, सहजावस्था श्वास लेने से भी 100 गुना अधिक सरल है।
सहजावस्था के स्वरूप को इन सूक्ष्म बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- श्वसन से अधिक सुलभ: यदि श्वास लेने का कार्य हमारी बुद्धि पर छोड़ दिया जाता, तो हम शायद ही उसे निरंतर चला पाते। सहजावस्था उससे भी अधिक प्राकृतिक है क्योंकि इसके लिए किसी क्रिया की आवश्यकता नहीं है, केवल ‘होने’ (Being) की आवश्यकता है।
- देह के प्रति सम्यक दृष्टि: इस अवस्था में साधक अपने शरीर को वैसे ही देखता है जैसे कोई अपनी प्रेमिका को देखता है। यहाँ न तो देह का अहंकार है और न ही उससे घृणा, बल्कि एक सहज स्वीकार और प्रेम है।
- समय और स्थान का अभाव: यह अवस्था किसी विशेष स्थान या समय (Time and Space) की प्रतीक्षा नहीं करती। यह इसी क्षण, इसी स्थान पर ‘अप्रत्यशित’ रूप से उपलब्ध है।
बुद्धि और अहंकार का मायाजाल: ‘होने’ और ‘बनने’ के बीच का संघर्ष
सहजावस्था दुर्लभ इसलिए लगती है क्योंकि हमारी बुद्धि को सरलता पर विश्वास ही नहीं होता। अहंकार सदैव ‘कुछ बनने’ (Becoming) की चेष्टा में लगा रहता है। हम कभी ‘पति’ बनते हैं, कभी ‘पिता’, और कभी ‘ज्ञानी’ बनने का नया अहंकार ओढ़ लेते हैं। यही ‘बनने’ की निरंतर दौड़ हमें ‘सहज होने’ से रोकती है।
सहज होने और असहज प्रयास के बीच का तात्विक अंतर:
| स्थिति | सहजता (Natural) | असहजता (Unnatural) |
| प्रयास | होना मात्र (Just Being) | कुछ बनने का प्रयास (जैसे पति या ज्ञानी बनना) |
| आधार | वर्तमान क्षण (Presence) | भविष्य की योजना या पूर्व संस्कार |
| दृष्टिकोण | साक्षी भाव (बिना किसी योजना के) | कर्ता भाव और पद-प्रतिष्ठा का मोह |
सत्य तो यह है कि ‘बनना’ ही सबसे बड़ा परिश्रम है, जबकि ‘होना’ तो विश्राम है।
अज्ञान और मिथ्या का खेल: चित्त की परतों को भेदती तात्विक दृष्टि
सहजावस्था को समझने के लिए ‘माया’ के स्वरूप को समझना अनिवार्य है। माया वह है जो ‘नहीं है’ (जो भासित होती है पर जिसकी वास्तविक सत्ता नहीं है)। यह चित्त की परतों के माध्यम से सत्य को धुंधला कर देती है।
तत्व दर्शन की अपरोक्ष अनुभूति के लिए स्रोत में एक अद्भुत ऋणात्मक (Reductive) तर्क दिया गया है:
- जिसे हम पृथ्वी कहते हैं, वह वास्तव में जल है।
- जल की उत्पत्ति अग्नि से है, अतः वह अग्नि है।
- अग्नि, वायु का ही एक रूप है।
- वायु, आकाश से उत्पन्न है।
- और आकाश के उस पार जो शेष रहता है, वह बुद्धि के लिए ‘अज्ञेय’ (Unknown) है।
यही ‘अज्ञेय’ ही सहज है। जब हम इस तात्विक दृष्टि से सब कुछ नकार देते हैं (नेति-नेति), तब जो शुद्ध ‘होनापन’ बचता है, वही हमारी वास्तविक स्थिति है।
सद्गुरु की करुणा: दुर्लभ को सुलभ बनाने वाली अंतिम कुंजी
अध्यात्म के शिखर पर सद्गुरु की करुणा को अनिवार्य माना गया है, क्योंकि वे ही ‘तर्क’ और ‘अनुभव’ रूपी तलवार प्रदान करते हैं।
- अंतिम बंधन का विसर्जन: गुरु केवल सांसारिक बंधनों को ही नहीं काटते, बल्कि वे साधक के सबसे सूक्ष्म बंधन—‘ज्ञानी होने के अहंकार’ को भी विसर्जित करवा देते हैं। यहाँ तक कि गुरु के प्रति आसक्ति भी अंततः एक बंधन है जिसे सद्गुरु की कृपा ही काटती है।
- शास्त्रों की सीमा: एक चैतन्य गुरु ही यह बोध करा सकता है कि “समस्त शास्त्र अज्ञानियों (मूर्खों) के लिए लिखे गए हैं।” जागृत होने के बाद न कोई शास्त्र शेष रहता है, न कोई गुरु, और न ही कोई शिष्य। केवल ‘स्वयं’ का प्रकाश शेष रहता है।
सद्गुरु की करुणा ही उस दुर्लभ को ‘अति सुलभ’ बनाती है जहाँ मुमुक्षु पूर्ण मौन में ठहर जाता है।
निष्कर्ष: एक शांत विश्राम और अनन्त ‘अहो भाव’
सहजावस्था कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है जिसे बहुत परिश्रम करके जीतना है। यह तो एक शांत विश्राम है—एक ऐसा मौन जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं। जब हम अपनी मान्यताओं और ‘कुछ बनने’ की व्याकुलता का त्याग कर देते हैं, तब जो शेष बचता है, वही सहज है।
इस बोध के क्षण में केवल एक ‘अहो भाव’ रह जाता है—एक विस्मयपूर्ण कृतज्ञता कि जिसे हम जन्मों से खोज रहे थे, वह तो श्वास से भी निकट था। सहजावस्था में ठहरना ही जीवन की पूर्णता है। यह वह गहन मौन है जहाँ केवल अस्तित्व का शुद्ध संगीत शेष रहता है।



