“मैं हूँ”: ब्रह्म या भ्रम?
एक सीधा उत्तर, अद्वैत वेदांत की दृष्टि से
“इस विषय पर हमारा विस्तृत मार्गदर्शन दिए गए वीडियो में देख सकते हैं।”
जब साधक भीतर की यात्रा पर निकलता है, एक दिन अचानक यह प्रश्न उसके सामने खड़ा होता है:
“जो ‘मैं’ अभी अनुभव हो रहा है…
क्या वही ब्रह्म है?
या यह भी किसी प्रकार का सूक्ष्म भ्रम है?”
यही प्रश्न आत्मज्ञान का द्वार खोलता है।
1. सबसे पहला उत्तर — ‘मैं हूँ’ न ब्रह्म है, न भ्रम
अद्वैत वेदांत कहता है:
“मैं ब्रह्म हूँ”—यह एक संकेत है।
“मैं भ्रम हूँ”—यह एक विचार है।
पर “मैं हूँ”—यह शुद्ध अनुभव है।
“मैं हूँ” वह आधार है
जो किसी भी विचार के आते-जाते रहने से नहीं बदलता।
2. ब्रह्म और भ्रम दोनों क्यों शब्द हैं, सत्य नहीं?
(A) ब्रह्म कहना—एक परिभाषा है
और ब्रह्म परिभाषित नहीं होता।
(B) भ्रम कहना—एक धारणा है
और धारणाएँ सदा बदलती रहती हैं।
अगर “मैं” ब्रह्म हूँ = एक विचार
अगर “मैं” भ्रम हूँ = दूसरा विचार
लेकिन—
जिसने इन दोनों विचारों को उठते-गिरते देखा,
अद्वैत उसी “देखने” को वास्तविक ‘मैं’ कहता है।
3. एक सरल उदाहरण
मान लीजिए:
आप सड़क पर चल रहे हैं।
अचानक मन कहता है—“मैं अच्छा हूँ।”
थोड़ी देर बाद कहता है—“मैं अच्छा नहीं हूँ।”
ये दोनों विचार आए और चले गए।
लेकिन इन विचारों के आने-जाने को
जिसने शांत होकर देखा…
वह कौन है?
वह न अच्छा है, न बुरा।
वह केवल “मैं हूँ”—साक्षी।
यही अद्वैत का मूल है।
4. तो असल में मैं कौन हूँ? ब्रह्म या भ्रम?
अद्वैत वेदांत का उत्तर अत्यंत सरल है:
जब ‘मैं’ विचार से जुड़ता है—भ्रम होता है।
जब ‘मैं’ विचार से अलग रहता है—ब्रह्म का स्पर्श होता है।
अर्थात—
“मैं ब्रह्म हूँ”—सही दिशा
“मैं भ्रम हूँ”—मन का दूसरा छोर
“मैं हूँ”—दोनों से परे, मौन उपस्थित सत्य
यह “मैं हूँ” किसी साधना से नहीं आता—
यह पहले से ही मौजूद है।
5. शास्त्र इसे कैसे समझाते हैं?
उपनिषद:
“नेति, नेति — न यह, न वह।”
सत्य किसी एक विचार में नहीं बँधता।
गीता:
“जो जानता है, वह कहता नहीं—वह स्थित रहता है।”
शब्द गिरते हैं, अनुभव बचता है।
योगवासिष्ठ:
“ज्ञान जोड़ने की चीज़ नहीं—अज्ञान हटाने की प्रक्रिया है।”
अर्थ यह कि—
ब्रह्म और भ्रम दोनों ही मन की परतें हैं।
सत्य इन दोनों के पार है।
6. रोज़मर्रा में ‘मैं हूँ’ को कैसे जिएँ?
- विचार उठे—बस देखें, उसमें न घुलें।
विचार में जाना = भ्रम
विचार को देखना = साक्षी - “मैं ब्रह्म हूँ” या “मैं भ्रम हूँ”—दोनों विचारों को ढीला छोड़ दें।
इनकी पकड़ ढीली पड़ते ही शांति प्रकट हो जाती है। - दिन में एक-दो मिनट केवल इतना महसूस करें:
“मैं हूँ।”
कुछ जोड़ने की जरूरत नहीं। - जब मन बेचैन हो, बस यह पूछें:
“इस बेचैनी को कौन देख रहा है?”
उत्तर वहीं मिलेगा। - सुख-दुख, सफलता-असफलता—इन सबको देखने की आदत बनाइए।
देखना = स्वतंत्र होना।
समापन
“सत्य शब्दों में नहीं,
उन शब्दों के बीच के मौन में है।”
“जब ‘मैं’ किसी विचार को पकड़ना छोड़ देता है—
वहीं ब्रह्म की पहचान स्वतः हो जाती है।”



