कुंडलिनी ऊर्जा — मिथ्याएँ, वास्तविकता और साधक की आंतरिक यात्रा

Nov 29, 2025 | दैनिक चिंतन

कुंडलिनी ऊर्जा की वास्तविक यात्रा — आदिसत्व जी का चिंतन

प्रस्तावना

कुंडलिनी शब्द सुनते ही मन में रहस्यमयी शक्ति, अचानक उठने वाली ऊर्जा, चमत्कारिक अनुभव और कई तरह की कहानियाँ उभर आती हैं।

परंतु सच्चाई इन सब से बहुत सरल, बहुत शांत और बहुत स्वाभाविक है।

निर्वाण धाम की दृष्टि में—
कुंडलिनी कोई घटना नहीं, बल्कि साधक के भीतर होने वाली परिपक्वता है।

ऊर्जा उठती नहीं,
बल्कि चित्त के साफ़ होने पर स्वतः ऊपर बहने लगती है।

आदिसत्व जी का उद्देश्य यही है—
साधक भ्रम से निकले,
स्पष्टता में आए,
और अपनी आंतरिक यात्रा को सहजता से समझ सके।


1. कुंडलिनी वास्तव में क्या है?

कुंडलिनी किसी साँप जैसी चीज़ नहीं,
न वह शरीर के किसी हिस्से में सोई हुई शक्ति है।

कुंडलिनी = चित्त की वह शक्ति जो ऊपर उठने की क्षमता रखती है।

जब मन, भावनाएँ और इच्छाएँ भारी होती हैं,
ऊर्जा नीचे की ओर रहती है।

जब मन हल्का होता है,
ऊर्जा ऊपर उठने लगती है—
स्वतः, बिना प्रयास, बिना प्रयोग।


2. सबसे बड़ी गलतफ़हमी — “कुंडलिनी उठ गई”

आदिसत्व जी कहते हैं:

“ऊर्जा उठती नहीं, केवल प्रवाहित होती है।
जहाँ मन अटका है, ऊर्जा भी वहीं अटक जाती है।”

इसलिए—

  • किसी झटके को

  • शरीर में हलचल को

  • भावनाओं की बाढ़ को

  • तंत्रिक स्पंदन को

कुंडलिनी उठना मान लेना—
यह केवल भ्रम है।

सच्चा उठना बाहर दिखाई नहीं देता, अंदर साफ़ होता है।


3. मूलाधार पर ऊर्जा क्यों अटक जाती है?

ऊर्जा का स्वभाव ऊपर की ओर है,
लेकिन मन उसे नीचे रोक लेता है।

ऊर्जा मूलाधार पर इसलिए अटकती है क्योंकि साधक के भीतर:

  • भय

  • वासना

  • असुरक्षा

  • क्रोध

  • पहचान का बोझ

  • अधूरा मन

ये सभी “गाँठों” की तरह ऊर्जा को पकड़ लेते हैं।

जब ये परतें ढीली पड़ती हैं—
ऊर्जा स्वतः ऊपर जाती है।
उठाई नहीं जाती।


4. ऊर्जा के ऊपर उठने के चार मार्ग

निर्वाण धाम में कुंडलिनी को किसी एक मार्ग से नहीं देखा जाता।
आदिसत्व जी बताते हैं कि ऊर्जा चारों मार्गों से ऊपर उठती है:

भक्ति

भाव पिघलते हैं → मन हल्का होता है → ऊर्जा उठती है।

योग

प्राण शुद्ध होते हैं → नाड़ी खुलती है → ऊर्जा ऊपर बहती है।

तंत्र

बंधनों का नाश होता है → अंदर गहराई बनती है → ऊर्जा विस्तार पाती है।

ज्ञान

अहंकार ढीला पड़ता है → दृष्टा जागता है → ऊर्जा स्वतः शुद्ध होती है।

चारों मार्ग मिलकर ऊर्जा को सहज रूप से ऊपर ले जाते हैं।


5. क्या विशेष तकनीकें कुंडलिनी उठाती हैं?

आदिसत्व जी स्पष्ट कहते हैं:

“तकनीकें मन को तैयार करती हैं,
ऊर्जा को नहीं उठातीं।
ऊर्जा खुद उठती है जब मन नीचे नहीं रहता।”

इसलिए—

  • जबरदस्ती ध्यान

  • अत्यधिक प्राणायाम

  • कठोर साधना

  • अचानक शक्तिपात

ये सब ऊर्जा को गड़बड़ भी कर सकते हैं।
ऊर्जा कभी असुरक्षित नहीं होती—
असुरक्षित है केवल मन।


6. साधक की परिपक्वता — असली ‘राइज़’

ऊर्जा के उठने के असली संकेत:

  • मन शांत

  • जीवन हल्का

  • चिंता कम

  • स्पष्टता बढ़ी

  • भीतर सहज मौन

  • अनुभव पर पकड़ घटती जा रही

  • बिना प्रयास गुरु-उपस्थिति महसूस होना

ऊर्जा ऊपर उठने लगती है जब मन नीचे नहीं रहता।

कुंडलिनी उठना =
साधक का परिपक्व होना।


7. शक्तिपात और गुरु-ऊर्जा — सत्य क्या है?

शक्तिपात कोई चमत्कार नहीं।
यह साधक की तैयारी पर निर्भर होता है।

  • गुरु दिशा देते हैं

  • ऊर्जा साधक की पात्रता से चलती है

  • गुरु का कार्य “प्रकाश” है, न कि “उठाना”

आदिसत्व जी का वाक्य:

“गुरु पानी दिखाता है,
प्यास साधक को बुझानी होती है।”


8. ऊर्जा और साक्षी — स्पष्ट अंतर

ऊर्जा (Urja)

  • मन के क्षेत्र की गति है

  • बदलती है: कभी तेज, कभी धीमी

  • ऊपर-नीचे बहती है

  • भावनाओं, विचारों और शरीर से प्रभावित होती है

  • कुंडलिनी = ऊर्जा का शुद्ध प्रवाह

साक्षी (Sakshi)

  • मन से परे है

  • कभी नहीं बदलती

  • न तेज होती है, न धीमी

  • न ऊपर जाती है, न नीचे

सार

ऊर्जा परिवर्तनशील है।
साक्षी अपरिवर्तनशील है।

ऊर्जा की यात्रा = कुंडलिनी
साक्षी की पहचान = निर्वाण


9. सहस्रार — अंतिम मंज़िल नहीं, सिर्फ मौन का खिलना

कई लोग सोचते हैं कि सहस्रार खुलना मतलब मोक्ष।

पर आदिसत्व बताते हैं:

“सहस्रार खुलना यात्रा का अंत नहीं, दृष्टि का आरंभ है।”

असली जागरण तब है जब:

  • देखने वाला स्थिर

  • अनुभव आते-जाते रहें

  • भीतर का मौन अडोल रहे

  • किसी भी भाव से पहचान न बने

यही “बूंद का सागर में और सागर का बूंद में विलय” है।


10. कुंडलिनी से जुड़े आधुनिक भ्रम

NirvanDham की दृष्टि से:

❌ कुंडलिनी चमत्कार नहीं है
❌ न वह खतरनाक है
❌ न यह कोई अचानक उठने वाली शक्ति है
❌ न देह के झटके इसका प्रमाण हैं
❌ न इसे जबरदस्ती उठाया जा सकता है

सत्य यह है:

असुरक्षित मन है,
कुंडलिनी नहीं।


समापन — आदिसत्व जी का अंतिम संदेश

“ऊर्जा को मत उठाओ।
वह स्वयं उठती है
जब तुम नीचे नहीं रहते।”

कुंडलिनी का सार यह नहीं कि अनुभव बदल जाएँ—
बल्कि यह कि अनुभवों पर पकड़ न रहे।

जब मन साफ़ होता है,
ऊर्जा ऊपर बहती है।

जब ऊर्जा मुक्त होती है,
दृष्टि साफ़ होती है।

और जब दृष्टि साफ़ होती है—
स्वभाव प्रकट होता है।

यही कुंडलिनी का वास्तविक अर्थ है।
यही साधक की सच्ची यात्रा है।
और यही निर्वाण धाम का संकेत।

और जानें — सत्य की ओर अगला कदम रखें।

Nirvan Dham

निर्वाणधाम

आदिगुरु–तत्त्व की शांति, स्पष्टता और सतत मार्गदर्शक उपस्थिति। सभी साधकों हेतु निर्मल, सरल और स्पष्ट दिशा।

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