साक्षीभाव और साक्षी — सूक्ष्म भेद का गहन विवेचन
(ज्ञानमार्ग की दृष्टि से आज की चर्चा का सार)
ज्ञानमार्ग में अनेक बार साधक दो वाक्य बोलता है—
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“मैं साक्षीभाव में हूँ।”
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“साक्षी है।”
पहली दृष्टि में दोनों समान प्रतीत होते हैं, परंतु आज की चर्चा में स्पष्ट हुआ कि दोनों वाक्यों के पीछे सूक्ष्म परंतु अत्यंत निर्णायक भेद है।
यह भेद वहीं दिखाई देता है जहाँ बुद्धि का संग्रह समाप्त होकर अनुभूति का प्रकाश प्रारंभ होता है।
“इस विषय पर हमारा विस्तृत मार्गदर्शन दिए गए वीडियो में देख सकते हैं।”
1. क्या ज्ञान अनुभूति में आता है?
ज्ञानमार्ग के अनुसार—
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ज्ञान = स्मृतियों का तर्कपूर्ण संयोजन
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संयोजन “चित्त” में होता है
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और चित्त स्वयं एक अनुभव है
अतः ज्ञान का उदय अनुभूति में ही होता है।
शंकराचार्य का कथन— “सौ वेद भी कह दें, पर यदि मेरे अपरोक्ष अनुभव में न हो तो स्वीकार नहीं।” —यही सिद्ध करता है।
2. “मैं साक्षीभाव में हूँ” — इसका अर्थ
यह वाक्य जहाँ बोला जाता है, वहाँ अब भी —
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अहम की सूक्ष्म उपस्थिति है
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“मैं” प्रयास कर रहा है
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“साक्षीभाव” एक वृत्ति है
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यह आती-जाती रहती है
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स्मरण-विस्मरण दोनों संभव हैं
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साधना, शुद्धि, अभ्यास चल रहा है
साक्षीभाव का अर्थ यहाँ है—
ज्ञान में स्थित होने का प्रयास, अर्थात् चित्त की ऊपर की परत पर उत्पन्न एक स्थायी-अस्थायी भावना।
यह माया के भीतर उत्पन्न सही दिशा है, परंतु अभी भी द्वैत है—
“मैं” बनाम “भाव”।
3. “साक्षी है” — इसका अर्थ
यह वाक्य उस दिशा की ओर इशारा करता है जहाँ—
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कोई “मैं” उपलब्ध नहीं
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कोई प्रयास नहीं
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कोई निष्कर्ष नहीं
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कोई चुनाव नहीं
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न ज्ञान है, न अज्ञान
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न अवस्था है, न अनुभव
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केवल होना-मात्र है
यह वह बिंदु है जहाँ साधक नहीं बोल रहा होता—
मौन स्वयं बोल रहा होता है।
साक्षी न अवस्था है न वृत्ति,
साक्षी स्वयंसिद्ध है—
वह न आती है न जाती है, न बदलती है न रुकती है।
“साक्षी है”— यह घोषणा नहीं,
बल्कि अनुपस्थित अहं का परिणाम है।
4. तो सरल शब्दों में भेद क्या है?
| वाक्य | स्थिति | प्रकृति |
|---|---|---|
| मैं साक्षीभाव में हूँ | साधक प्रयासरत है | वृत्ति, अभ्यास, माया-के भीतर |
| साक्षी है | साधक अनुपस्थित | मौन, स्वयंसिद्धता, निष्कर्षहीन होना |
पहले वाक्य में—
“मैं” ज्ञान को धारण कर रहा है।
दूसरे वाक्य में—
धारण करने वाला ही नहीं बचा।
5. साधक यह दोनों बातें कैसे कह सकता है?
क्योंकि दोनों अलग स्तरों पर घटती हैं—
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व्यवहार स्तर (द्वैत)
जहाँ साधक है
जहाँ साधना है
जहाँ “मैं साक्षीभाव में हूँ” कहा जाता है -
अस्तित्व स्तर (अद्वैत)
जहाँ साधक ही अनुपस्थित
जहाँ केवल “साक्षी है”
साधक दोनों में नहीं जीता,
बल्कि एक से दूसरे की ओर यात्रा करता हुआ प्रतीत होता है।
अद्वैत में पहुँचकर तो —
न साधक बचता है, न यात्रा।
6. दृष्टि में क्या परिवर्तन आता है?
चर्चा में यह भी स्पष्ट हुआ कि—
साक्षीभाव में संसार कैसा दिखता है?
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शांति
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थोड़ी निर्लिप्तता
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स्मरण-विस्मरण
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अभ्यास
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द्वैत बना रहता है
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संसार “मेरे सामने” दिखता है
साक्षी में संसार कैसा दिखता है?
संसार नहीं रहता।
क्योंकि:
“मैं ही नहीं बचा… तब संसार कहाँ?”
यह वह बिंदु है जहाँ—
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कोई रस संसार में नहीं
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कोई आग्रह नहीं
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कोई लिप्तता नहीं
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कोई निष्कर्ष नहीं
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केवल घटना अपने आप घट रही है
7. अंतिम सार
साक्षीभाव साधना का कांटा है—
अन्य संस्कारों को निकालने के लिए।
साक्षी कांटा भी नहीं—
क्योंकि वहाँ न निकालना है, न पकड़ना।
न धारण है, न त्याग।
केवल होना।
निष्कर्ष
“मैं साक्षीभाव में हूँ”— यह ज्ञान का अभ्यास है।
“साक्षी है”— यह ज्ञान का विसर्जन है।
पहला द्वैत का,
दूसरा अद्वैत का।
पहले में साधक है,
दूसरे में केवल मौन है।
चर्चा का सार यही —
जहाँ निष्कर्ष है, वहाँ अभी ‘भाव’ है।
जहाँ कुछ कहने को नहीं, वहीं ‘साक्षी’ है।



