⭐ मनन–उत्तर (प्रश्न २): प्रमाण क्या है और क्यों आवश्यक है?
प्रस्तावना
ज्ञानमार्ग में “प्रमाण” का अर्थ है—
जो किसी बात की सत्यता को मेरे स्वयं के अनुभव और तर्क से स्थापित करे।
बिना प्रमाण के जो भी स्वीकार किया जाता है, वह केवल मान्यता या अन्य का ग्यान है,
जो मेरे लिए अज्ञान ही रहेगा।
मुख्य उत्तर
१. प्रमाण = अपना प्रत्यक्ष ज्ञान
मैं किसी भी बात को तभी प्रामाणिक मानता हूँ जब वह
मेरे अपने अपरोक्ष अनुभव में सत्य उतरती है।
ऐसा ज्ञान किसी पुस्तक, गुरु या परंपरा से उधार नहीं होता—
वह मेरा स्वयं का प्रत्यक्ष बोध होता है।
इसीलिए वही सबसे प्रामाणिक ज्ञान है।
२. प्रमाण के बिना — सब कुछ केवल अनेक मान्यताएँ
यदि कोई बात मेरे अनुभव पर खड़ी नहीं है,
तो वह किसी दूसरे का ज्ञान है—
अर्थात् मान्यता या अंधविश्वास।
ज्ञानमार्ग में यह स्पष्ट है—
बिना प्रमाण के कोई भी शिक्षा मायिक कथन है।
३. अनुभव और तर्क—दोनों प्रमाण एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं
मैंने प्रत्यक्ष अनुभव से देखा है कि—
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जो बदलता है, वह सत्य नहीं हो सकता
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जो नहीं बदलता, वही तत्त्व है
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अनुभव बदलता है
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अनुभवकर्ता नहीं बदलता
इससे यह स्पष्ट हो जाता है—
तत्त्व एक ही है — अनुभवकर्ता।
दो सत्य नहीं हो सकते।
और यह निष्कर्ष तर्क से भी पूर्णतः संगत है।
इसलिए प्रमाण के दोनों आधार—अनुभव और तर्क—एक-दूसरे का समर्थन करते हैं।
४. जहाँ प्रमाण नहीं — वहाँ ज्ञान नहीं
मेरे अनुभव में—
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बिना प्रत्यक्ष अनुभव के ज्ञान संभव नहीं
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जो प्रमाणित नहीं, वह “मेरा” ज्ञान नहीं
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केवल तर्क या केवल शब्द ज्ञान नहीं बनाते
“ज्ञान” बनने की एक ही शर्त है—
उसका मेरे अनुभव में सत्य होना।
जहाँ यह सत्यापन नहीं हुआ, वहाँ केवल अज्ञान है।
५. प्रमाण साधक को अंधविश्वास से बचाता है
ज्ञानमार्ग में हर शिक्षा को दो कसौटियों पर जाँचा जाता है—
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क्या यह मेरे अनुभव में सत्य है?
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क्या यह तर्क से असंगत नहीं है?
जब मैं इन दोनों प्रमाणों को लागू करता हूँ,
तो कई पुरानी मान्यताएँ स्वतः ही गिर जाती हैं।
जो पहले “सत्य” लगता था, वह अब स्पष्ट रूप से मिथ्या दिखता है।
यही प्रक्रिया अंधविश्वास को नष्ट करती है और ज्ञान को जन्म देती है।
उदाहरण
पहले मैं भी कई बातों को सत्य मान लेता था—
जैसे शरीर ही “मैं” हूँ, मन ही मेरी पहचान है, सुख-दुःख मेरे साथ हो रहे हैं।
लेकिन जब ज्ञानमार्ग के दो प्रमाणों से देखा—
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अनुभव बदलता है → सत्य नहीं
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अनुभवकर्ता नहीं बदलता → वही तत्त्व है
तो स्पष्ट हुआ—
बहुत-सी बातें जिन्हें मैं सत्य मानता था, वे केवल मान्यताएँ थीं।
प्रमाण लागू होते ही वे स्वयं गिर गईं।
निष्कर्ष (Manan Conclusion)
प्रमाण ज्ञानमार्ग की रीढ़ है क्योंकि—
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जो प्रमाणित नहीं — वह अज्ञान है
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जो केवल सुना गया — वह ज्ञान नहीं
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जो अनुभव और तर्क में सत्य है — वही वास्तविक ज्ञान है
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प्रमाण मुझे स्वयं के सत्य तक पहुँचाता है
और अंतिम सत्य यह है—
ज्ञान प्रमाण से उत्पन्न होता है; अज्ञान प्रमाण से नष्ट होता है।
प्रमाण के बिना कोई भी साधना, कोई भी शिक्षा, कोई भी मार्ग सार्थक नहीं।



