⭐ मनन–उत्तर (प्रश्न ४)
परिभाषा
अज्ञेयता वह है जिसे जाना नहीं जा सकता।
जो कुछ भी जाना जाए — वह अनुभव है, और इसलिए परिवर्तनशील।
परिवर्तनशील ज्ञेय है;
अपरिवर्तनशील अज्ञेय।
सत्य और तत्त्व — दोनों अज्ञेय हैं, क्योंकि उनका कोई अनुभव नहीं हो सकता।
विस्तार
१. अज्ञेयता बुद्धि को उसकी सीमा दिखाती है।
बुद्धि केवल ज्ञेय को जान सकती है;
तत्त्व ज्ञेय नहीं है।
यह देखते ही बुद्धि के दावे गिर जाते हैं और खोज शांत हो जाती है।
२. अज्ञेयता अहंकार को समाप्त करती है।
यदि सत्य ज्ञेय होता, अहंकार तुरन्त कहता — “मैंने जान लिया।”
जब जानना ही असंभव है, अहंकार टिक नहीं सकता।
३. अज्ञेयता साधक को गलत मार्गों से बचाती है।
अवस्था, सिद्धि, अनुभूति — ये सभी ज्ञेय हैं और इसलिए मिथ्या।
अज्ञेयता स्पष्ट कर देती है कि इनमें सत्य की खोज व्यर्थ है।
४. अज्ञेयता अनुभवों की आसक्ति समाप्त करती है।
जो ज्ञेय है — वह अनुभव है।
जो अनुभव है — वह अनित्य है।
जो अनित्य है — वह सत्य नहीं।
इससे अनुभवों पर आधारित साधना स्वतः समाप्त हो जाती है।
५. अज्ञेयता साधक को “जानने” से “होने” की ओर ले जाती है।
जब जानना असंभव दिखता है, साधक स्वाभाविक रूप से साक्षीभाव में स्थित होता है।
साक्षीभाव ही होना है।
६. अज्ञेयता साधना को सरल बनाती है।
जो जाना ही नहीं जा सकता, उसके लिए प्रयास भी नहीं होता।
साधना बिना तनाव, बिना संघर्ष, सहज रूप से चलती है।
७. अज्ञेयता भ्रमों और मिथ्या निष्कर्षों से बचाती है।
साधक जानता है —
जितना भी ज्ञेय है, सब अनुभव है;
और अनुभव मिथ्या है।
इससे किसी अनुभूति को सत्य मानने की भूल नहीं होती।
निष्कर्ष
अज्ञेयता साधक की रक्षा है।
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यह बुद्धि को सीमित करती है।
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अहंकार को अवकाश नहीं देती।
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अनुभवों और अवस्थाओं में फँसने से रोकती है।
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साधना को सरल, सहज और शुद्ध बनाती है।
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साधक को साक्षीभाव में स्थिर करती है।
अज्ञेयता मार्ग का बोझ नहीं —
मार्ग की सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।
यही इसका उपयोग है।


