आत्म-स्मृति: चित्त के प्रतिरूपों से ब्रह्म-विलयन का एक अपरोक्ष विवेचन
अद्वैत वेदांत और ज्ञान मार्ग की पूरी साधना का सार केवल एक शब्द में सिमटा है—स्मृति। संसार का अर्थ है ‘विस्मृति’ (भूल जाना) और मोक्ष का अर्थ है ‘स्मृति’ (याद आ जाना)। हम ब्रह्म ‘बनते’ नहीं हैं, हम ब्रह्म ‘हैं’, बस हम इसे भूल गए हैं।
१. चित्त और ज्ञान का संग्रह: प्रतिरूपों (Patterns) का जाल
साधना की सूक्ष्मताओं को समझने से पहले हमें उस यंत्र को समझना होगा जिसे हम ‘मैं’ मान बैठते हैं—हमारा चित्त। चित्त वास्तव में ज्ञान और अनुभवों का एक विशाल कोष है। यह हमारे जीवन के अनुभवों को प्रतिरूपों (Patterns) के रूप में संग्रहित करता है।
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अनुभूतिजन्य प्रतिरूप: इंद्रियों द्वारा सीखी गई क्रियाएं जैसे चलना, खाना या किसी वस्तु को पहचानना—यह सब स्मृतिजनित प्रतिरूपों का मिलान मात्र है।
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अमूर्त संरचनाएं: गणितीय वस्तुएं, भौतिक प्रतिरूपण और विचार—ये प्रतिरूपों के भी प्रतिरूप हैं।
आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के विकास ने हमें यह समझने में मदद की है कि चित्त का संगठन अक्सर कलनविध्यात्मक (Algorithmic) और क्रमविकासी (Evolutionary) होता है। यह चित्त ही वह धरातल है जहाँ अज्ञान और ज्ञान का खेल चलता है।
२. चित्तों की विविधता और बेन गोर्त्जेल का वर्गीकरण
वातावरण और भौतिक आधार के अनुसार चित्त कई प्रकार के हो सकते हैं। हमारा ‘मानवचित्त’ केवल एक प्रकार है। बेन गोर्त्जेल के अनुसार, चित्तों की श्रेणियों को समझना हमें यह बोध कराता है कि ‘चेतना’ किसी एक शरीर तक सीमित नहीं है:
| चित्त का प्रकार | परिभाषा |
| एकदेही (Monobody) | एक एकाकी भौतिक तंत्र को नियंत्रित करने वाला। |
| बहुदेही (Multibody) | कई वियोजित भौतिक तंत्रों का नियंत्रण। |
| विदेही (Bodyless) | भौतिक आधार पर स्थित, किन्तु किसी पारंपरिक शरीर का उपयोग न करने वाला। |
| देहकेन्द्रित (Embodied) | शरीर और वातावरण के प्रतिरूपों से उभरने वाला। |
| बहुचित्त (World-mind) | सहयोगी इकाइयों का समूह जहाँ हर इकाई एक चित्त है। |
३. द्रष्टा-दृश्य विवेक और स्मृति की नींव
श्री तरुण प्रधान जी के ‘अपरोक्षानुभव’ के लेख में एक बहुत ही अचूक तर्क दिया गया है—“जो दिखाई देता है, वह देखने वाला नहीं हो सकता।” आत्म-बोध की शुरुआत इसी स्मृति से होती है कि मैं यह शरीर नहीं हूँ।
जैसे मैं सामने रखी मेज़ को देख रहा हूँ, वैसे ही मैं अपने हाथ, पैर और शरीर की संवेदनाओं को भी देख रहा हूँ। जो ‘दृश्य’ है, वह ‘द्रष्टा’ कैसे हो सकता है? अतः हर अनुभव के समय यह स्मृति बनी रहे: “मैं दृश्य नहीं, मैं ज्ञाता (The Knower) हूँ।”
४. मांडूक्य उपनिषद: चेतना की परतों में स्मृति का प्रवाह
मांडूक्य उपनिषद हमें चेतना की चार अवस्थाओं के माध्यम से स्वयं को साधने की विधि दिखाता है:
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जाग्रत (A): बाहरी जगत की भीड़ में यह स्मृति बनी रहे कि मैं इस शरीर का साक्षी हूँ।
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स्वप्न (U): मानसिक कल्पनाओं के बीच भी यह बोध न खोए कि यह सब मन का खेल है और मैं इसका दृष्टा हूँ।
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सुषुप्ति (M): गहरी नींद के उस ‘अज्ञान’ में भी एक सूक्ष्म स्मृति शेष रहती है, तभी हम जागने पर कह पाते हैं कि “मैं सुख से सोया।” उस ‘पता न होने’ को भी जो ‘जान’ रहा था, वही मैं हूँ।
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तुरीय (The Fourth): यह वह अवस्था है जहाँ स्मृति ‘विचार’ नहीं रहती, बल्कि ‘अनुभव’ बन जाती है। तुरीय वह अखंड स्मृति है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओं में एक समान बहती है।
| अक्षर (मात्रा) | चेतना की अवस्था | पारिभाषिक नाम |
| A (अ) | जाग्रत (Waking) | वैश्वानर (बाहरी दुनिया का ज्ञान) |
| U (उ) | स्वप्न (Dream) | तैजस (भीतर के सूक्ष्म जगत का ज्ञान) |
| M (म) | सुषुप्ति (Deep Sleep) | प्राज्ञ (ज्ञान का घन पुंज, जहाँ कोई भेद नहीं) |
| Silence (मौन) | तुरीय (The Fourth) | शुद्ध चैतन्य (साक्षी) |
५. तुरीय और तुरीयातीत का अंतर
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तुरीय (The Witness): यह वह अवस्था है जहाँ आप जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के साक्षी (Witness) बनते हैं। यहाँ अभी भी एक सूक्ष्म ‘भेद’ है—एक तरफ ‘तीन अवस्थाएँ’ हैं और दूसरी तरफ उन्हें देखने वाला ‘साक्षी’।
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तुरीयातीत (The Absolute): यह वह स्थिति है जहाँ साक्षी और दृश्य का भेद भी समाप्त हो जाता है। यहाँ न कोई देखने वाला बचता है, न कुछ देखने को। यहाँ ‘चौथा’ होने का बोध भी विलीन हो जाता है और केवल अद्वैत (Non-duality) शेष रहता है।
एक उदाहरण से समझें: कल्पना कीजिए कि आप एक फिल्म देख रहे हैं:
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तीन अवस्थाएँ: फिल्म के अलग-अलग दृश्य (सुख, दुख, भागदौड़)।
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तुरीय: आप वह सफेद पर्दा (Screen) हैं जिस पर फिल्म चल रही है। फिल्म बदलती है, पर पर्दा नहीं बदलता।
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तुरीयातीत: फिल्म खत्म हो गई, प्रोजेक्टर बंद हो गया। अब न पर्दा है, न देखने वाला—केवल प्रकाश (Pure Light) है।
६. स्मृति: विलयन का अनिवार्य घटक
अहंकार केवल एक भ्रम (Illusion) है। भ्रम को मिटाने के लिए किसी क्रिया की नहीं, केवल ‘सत्य के स्मरण’ की आवश्यकता होती है। जैसे ही यह स्मृति अखंड होती है कि “मैं अखंड चैतन्य हूँ”, वैसे ही ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ के बीच का कल्पित भेद समाप्त हो जाता है। विलयन का अर्थ कहीं गायब होना नहीं, बल्कि उस ‘पर्दे’ (अहंकार) का गिर जाना है जो हमें खुद से अलग महसूस करा रहा था।
विशेष अभ्यास: ‘स्मृति’ का जीवंत प्रयोग (Self-Inquiry Vidhi)
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प्रथम चरण: आँखें बंद करें। अपने हाथों की संवेदना को महसूस करें। विचार करें—”मैं इन संवेदनाओं को जान रहा हूँ, अतः मैं शरीर नहीं हूँ।”
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द्वितीय चरण: मन में उठते विचारों को देखें। विचार करें—”मैं विचारों का ज्ञाता हूँ, अतः मैं मन नहीं हूँ।”
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तृतीय चरण: उस ‘जानने वाले’ के केंद्र में ठहरें। बिना किसी नाम या लेबल के, बस अपनी ‘उपस्थिति’ (Presence) को महसूस करें।
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चतुर्थ चरण: इस मौन में जो जागृति शेष है, वही तुरीय है। दिन भर के कार्यों के बीच, बस कुछ पलों के लिए इस स्मृति को वापस लाएं—“मैं पर्दा हूँ, कहानी नहीं।”
निष्कर्ष: अपरोक्षानुभूति की ओर
जब आत्म-विस्मृति का अंधेरा छँट जाता है और स्मृति सहज हो जाती है, तब उसे ही ‘सहजावस्था’ कहते हैं। श्री तरुण प्रधान जी के शब्दों में, द्रष्टा और दृश्य का विवेक ही वह कुंजी है जो हमें शरीर के ‘अहं’ से मुक्त करती है। जैसे-जैसे यह स्मृति प्रगाढ़ होती है, चित्त के द्वारा बुने गए ‘मनुष्य होने के भ्रम’ का अंत हो जाता है।
“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा” — मोह नष्ट हो गया और वास्तविक आत्म-स्मृति प्राप्त हो गई।
सन्दर्भ और आभार (References):
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श्री तरुण प्रधान: चित्त ज्ञान का कोष है और अपरोक्षानुभव की व्याख्या।
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जे. स्टोर्स हॉल / बेन गोर्त्जेल: Kinds of Minds – कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ज्ञानमीमांसा।
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मांडूक्य उपनिषद: चेतना की चार अवस्थाओं (A-U-M) का आध्यात्मिक विवेचन।



