हम जिस संसार में सांस लेते हैं, जिसे अपनी इंद्रियों से स्पर्श करते हैं और अनुभव करते हैं, वह हमें ठोस और ‘सत्य’ प्रतीत होता है। परंतु जब हम उपनिषदों की गहराई में उतरते हैं या ऋषियों की वाणी सुनते हैं, तो वे इस दृश्यमान जगत को ‘माया’ या ‘मिथ्या’ कहकर संबोधित करते हैं। यहीं से एक साधक के भीतर गहरा द्वंद्व (Duality) जन्म लेता है—यदि यह जगत सामने दिख रहा है, तो यह झूठ कैसे हो सकता है? और यदि यह असत्य है, तो इसमें होने वाले सुख-दुख इतने वास्तविक क्यों लगते हैं? क्या सत्य और असत्य के बीच भी कोई ऐसी अवस्था है जो अनिर्वचनीय है?
‘निर्वाण धाम’ की सत्संग परंपरा और अद्वैत वेदांत के आलोक में, आइए माया के इस अद्भुत विरोधाभास को चार मुख्य सूत्रों के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
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1. सूत्र 1: सदसद्विलक्षणम — जो न सत्य है, न असत्य
आदि शंकराचार्य ने माया की विलक्षणता को समझाने के लिए एक अत्यंत सूक्ष्म शब्द का प्रयोग किया है: ‘सदसद्विलक्षणम’ (Sadasad-vilakshanam)। साधारणतः हमारी बुद्धि केवल दो ही श्रेणियों को जानती है—या तो कोई वस्तु ‘है’ (सत्य) या वह ‘नहीं है’ (असत्य)। लेकिन माया इन दोनों ही सीमाओं को तोड़ देती है।
जो सदैव अपरिवर्तनशील रहे, वह ‘सत्य’ (ब्रह्म) है। इसके विपरीत, जो कभी अस्तित्व में था ही नहीं, जैसे ‘बंध्या-पुत्र’ (बांझ स्त्री का पुत्र) या ‘खरगोश के सींग’, वह ‘असत्य’ (Asat) है। माया इन दोनों से भिन्न है। यह दिखाई देती है, इसलिए इसे ‘असत्य’ नहीं कह सकते; लेकिन यह ज्ञान होने पर मिट जाती है, इसलिए इसे ‘सत्य’ भी नहीं माना जा सकता। यह ब्रह्म का एक ‘विवर्त’ (Vivarta) है—अर्थात ब्रह्म का वैसा ही प्रतिबिंब जो मूल स्वरूप को बदले बिना भासता है।
“ब्रह्म सदसद्विलक्षणम सत और असत से परे है। यह शुद्ध चैतन्य है जो रूप, गुण या स्थिति से असीमित है।”
यह केवल बौद्धिक परिभाषा नहीं है, बल्कि ‘अनिर्वचनीय’ अनुभव की एक परत है। माया वह स्थिति है जहाँ शून्य से ही सारी संभावनाएँ अंकुरित होती हैं।
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2. सूत्र 2: रस्सी और सर्प का विरोधाभास
ज्ञान मार्ग में अक्सर यह तार्किक संकट खड़ा होता है कि माया और ब्रह्म का संबंध क्या है? यहाँ दो प्रमुख तर्क दिए जाते हैं जो बुद्धि को चकरा देते हैं:
- द्वैत का तर्क: यदि माया ब्रह्म से भिन्न है, तो अस्तित्व में दो स्वतंत्र सत्ताएँ हो गईं—ब्रह्म और माया। इससे अद्वैत खंडित हो जाता है और ‘द्वैत’ वास्तविक लगने लगता है।
- विकार का तर्क: यदि माया ब्रह्म से अभिन्न (एक ही) है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि ब्रह्म स्वयं बदल रहा है और उसमें ‘विकार’ (Flaw/Change) आ गया है।
इस विरोधाभास का समाधान ‘रस्सी और सर्प’ के दृष्टांत से मिलता है। कम प्रकाश में जब रस्सी में सर्प भासता है, तो क्या रस्सी वास्तव में सांप बन गई? नहीं। रस्सी में कोई विकार नहीं आया, वह पूर्ण और अपरिवर्तित रही। विकार ब्रह्म में नहीं, बल्कि हमारी ‘चित्त-वृत्ति’ में होने वाला एक ‘अध्यास’ (Superimposition) है। सत्य तो यह है कि उस पूर्णता में ‘विकार’ भी पूर्ण ही है, क्योंकि वह ब्रह्म से पृथक है ही नहीं।
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3. सूत्र 3: दो सत्य और व्यवहारिक जगत की भूमिका
अध्यात्म में सत्य को समझने के लिए दो दृष्टियाँ दी गई हैं: ‘व्यवहार’ (Transactional) और ‘परमार्थ’ (Absolute)। साधक अक्सर उलझ जाते हैं कि यदि संसार मिथ्या है, तो भूख क्यों लगती है या कर्म क्यों करें?
इसे इंद्रधनुष (Rainbow) के उदाहरण से समझें। एक बालक इंद्रधनुष को देखकर आह्लादित होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह केवल प्रकाश का एक विवर्तन मात्र है। फिर भी, वह अपने अस्तित्व के बिना भी बच्चे को खुशी देने का अपना ‘व्यवहारिक कार्य’ (Vyavaharik Karya) पूर्ण करता है। इसी प्रकार, जब तक हम अज्ञान की निद्रा में हैं, यह जगत और इसके नियम हमारे लिए सत्य की भांति कार्य करेंगे।
“व्यवहार में जगत सत्य है, लेकिन परमार्थ की दृष्टि से, ज्ञान मार्ग की दृष्टि से कह देते हैं माया मिथ्या है।”
यहाँ यह चेतावनी आवश्यक है कि यदि शास्त्रों की सूचनाएँ केवल मस्तिष्क में रह जाएं, तो वे भी ‘अज्ञान के साधन’ बन सकती हैं। सच्चा बोध सूचनाओं के संग्रह में नहीं, बल्कि ‘अपरोक्ष अनुभूति’ (Direct Experience) में है।
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4. सूत्र 4: शब्दों से परे ‘होना मात्र’
ज्ञान मार्ग का अंतिम लक्ष्य शास्त्रों के शब्दों में उलझना नहीं, बल्कि उस ‘मौन’ को पाना है जहाँ कोई अवधारणा शेष न रहे। वेदांत में इसे ‘अंगुली-निर्देश’ (Finger pointing to the Moon) के न्याय से समझाया गया है। शास्त्र उस उंगली की तरह हैं जो चंद्रमा (सत्य) की ओर संकेत करती हैं। एक बार जब आप चंद्रमा को देख लेते हैं, तो उंगली का प्रयोजन समाप्त हो जाता है और उसे त्यागना ही पड़ता है।
सत्य को किसी विषय (Object) की तरह ‘जाना’ नहीं जा सकता, क्योंकि जानने वाला स्वयं सत्य ही है। इसलिए, यहाँ ‘जानना’ नहीं, बल्कि ‘होना मात्र’ (Just Being) शेष रह जाता है। जब अज्ञान की ग्रंथि कटती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सब कुछ उस ‘शून्य’ से ही प्रकट हो रहा है। इस स्थिति में शास्त्रीय ज्ञान की चादर भी उतर जाती है और साधक उस अद्वैत स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाता है जहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिट जाता है।
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निष्कर्ष: जागने के बाद का स्वप्न
माया को समझना अज्ञान को मिटाने की नहीं, बल्कि अज्ञान को ‘अज्ञान’ के रूप में पहचान लेने की प्रक्रिया है। जीवन को एक ऐसे स्वप्न की तरह देखना ही वास्तविक साधना है, जिसे देखते हुए भी भीतर यह बोध बना रहे कि ‘मैं’ इस दृश्य का हिस्सा नहीं, इसका आधार हूँ।
जैसे जागने के बाद स्वप्न का संसार विलीन नहीं होता, बल्कि उसका ‘सत्यत्व’ समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञानी के लिए संसार एक खेल (लीला) बन जाता है। वह व्यवहार तो सांसारिक व्यक्ति की तरह ही करता है, परंतु उसमें आसक्त नहीं होता।
एक विचारणीय प्रश्न: यदि देखने वाला (दृष्टा) और जो देखा जा रहा है (दृश्य), दोनों वास्तव में एक ही चैतन्य के विवर्त हैं, तो क्या वास्तव में कभी कोई बंधन था, या यह केवल ‘होने’ के भीतर एक खेल मात्र था?



