अद्वैत वेदांत की आधारशिला यह है कि केवल ब्रह्म ही सत्य है—वह पूर्ण, शुद्ध और सर्वज्ञ है। परंतु यहीं एक सूक्ष्म पहेली खड़ी होती है: यदि प्रकाश ही एकमात्र वास्तविकता है, तो अज्ञान की यह छाया कहाँ से आई? यह प्रश्न केवल एक बौद्धिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि जैसा कि सत्संग की गहराइयों में कहा गया है, यह ‘कृपा से उपजा हुआ प्रश्न’ है। यह हमें उस तार्किक जाल की ओर ले जाता है जिसे अक्सर साधक “ईश्वरीय त्रुटि” समझ बैठते हैं।
2. तर्क का जाल: क्या अज्ञान ब्रह्म को अपूर्ण बनाता है?
जब हम ब्रह्म को ‘शुद्ध’ या ‘सर्वज्ञ’ जैसे विशेषणों से अलंकृत करते हैं, तो हम अनजाने में उसे ‘अशुद्ध’ और ‘अज्ञानी’ जैसे द्वैत की संभावनाओं में धकेल देते हैं। सत्य यह है कि ब्रह्म ‘अनिर्वचनीय’ है, वह सभी गुणों से परे ‘निर्गुण’ है। शब्दों की सीमाएं ही उस अनंत को परिभाषित करने के प्रयास में विपरीतताओं का सृजन करती हैं।
यहाँ अज्ञान और ज्ञान के बीच एक मौलिक भेद है जिसे समझना अनिवार्य है। अज्ञान केवल जानकारी का अभाव नहीं है, बल्कि उन अवधारणाओं की उपस्थिति है जिनका कोई ‘अपरोक्ष अनुभव’ (Direct Experience) नहीं है।
- समस्या: यदि अज्ञान ब्रह्म से निकला, तो ब्रह्म अपूर्ण हुआ; यदि कहीं और से आया, तो अद्वैत खंडित हुआ।
- वास्तविकता: अज्ञान केवल एक ‘प्रतीति’ (Appearance) है, जो ब्रह्म की पृष्ठभूमि पर वैसे ही घटती है जैसे सिनेमा के पर्दे पर दृश्य।
3. स्वयं का बंधन: अज्ञान कोई वस्तु नहीं, एक धारणा है
अज्ञान कोई भौतिक पदार्थ नहीं है जिसे हटाया जा सके, यह तो केवल एक ‘मिथ्या धारणा’ है। रूपक के तौर पर देखें तो यह ऐसा है जैसे आपने स्वयं ही एक रस्सी को अपने शरीर पर लपेट लिया हो और उसे कसकर पकड़े बैठे हों। बंधन रस्सी में नहीं, आपकी ‘पकड़’ में है।
सच्चाई यह है कि ज्ञान की कोई गंगा बाहर से आकर नहीं बहती। अज्ञान का केवल ‘दिख’ जाना ही उसका विसर्जन है। जैसे ही आप अपनी पकड़ ढीली करते हैं, आप पाते हैं कि आप तो सदा से मुक्त ही थे।
“अज्ञान का दिखना ही उसका नाश है… आप तो सदा से मुक्त थे, आपके ऊपर कभी कोई बंधन था ही नहीं।”
4. अज्ञान का न आदि है, न अंत
अज्ञान की प्रकृति बड़ी विचित्र और ‘अनंत’ है। यदि कोई ‘ज्ञाता’ अज्ञान के स्रोत को खोजने निकलेगा, तो वह कभी सफल नहीं होगा। इसका कारण यह है कि खोजने वाला ‘ज्ञाता’ स्वयं उसी माया का उत्पाद है जिसे वह ढूंढ रहा है। यह एक ‘तर्क चक्र’ है जहाँ अज्ञान ही अज्ञान को खोजने का प्रयास करता है।
मनुष्य का जन्म और उसकी स्मृतियाँ अज्ञान की इसी अंतहीन यात्रा का हिस्सा हैं। ज्ञान सरल और सीधा होता है, जबकि अज्ञान की संभावनाएं असीम हैं। जब तक ‘मैं’ (अहंकार) का केंद्र बना हुआ है, यह अज्ञान किसी न किसी रूप में अपनी सत्ता बनाए रखता है।
5. ओशो का दृष्टिकोण: दृष्टा और दृश्य का खेल
संसार की सत्ता पूरी तरह से ‘व्यक्ति-सापेक्ष’ है। ओशो का यह संकेत अत्यंत तीक्ष्ण है कि संसार का अस्तित्व केवल तब तक है जब तक उसे देखने वाला दृष्टा मौजूद है। जिस क्षण व्यक्ति का अहंकार विसर्जित होता है, उसके लिए यह अज्ञान रूपी जगत भी विलीन हो जाता है।
यह आभास तब होता है जब हम समझते हैं कि दृश्य की वास्तविकता दृष्टा के होने पर टिकी है। जब ‘मैं’ नहीं रहता, तो जगत की अज्ञानता का ‘प्रश्न’ हल नहीं होता, बल्कि वह पूरी तरह से ‘विघटित’ हो जाता है।
6. पूर्णता का गणित: शून्य और अनंत
उपनिषदों का ‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ का सिद्धांत अज्ञान की स्थिति को स्पष्ट करता है। ब्रह्म एक ऐसी पूर्णता है जिससे यदि कुछ निकाला भी जाए, तो भी वह पूर्ण ही रहता है। अज्ञान या अविद्या कोई ‘त्रुटि’ नहीं है, बल्कि उस शून्य/अनंत की एक ‘अनंत संभावना’ है।
- पूर्णता का स्वभाव: ब्रह्म से जो भी निकलता प्रतीत होता है, वह भी मूलतः पूर्ण ही है।
- अपरिवर्तनीयता: पूर्ण में से पूर्ण को घटाने या जोड़ने पर भी शेष केवल पूर्ण ही बचता है।
- अविद्या की स्थिति: अज्ञान ब्रह्म के भीतर एक संभावना मात्र है, जो उसकी पूर्णता को कभी भंग नहीं कर सकती।
7. निष्कर्ष: एक विचारोत्तेजक अंत
ज्ञान और अज्ञान दोनों एक ही चेतना के पर्दे पर उभरने वाली ‘प्रतीतियाँ’ हैं। अज्ञान की आग से वह पर्दा कभी नहीं जलता जिस पर वह दिखाई दे रही है। अंततः, यह स्पष्ट होता है कि जिसे हम अज्ञान कह रहे हैं, वह भी ‘मुझसे’ भिन्न नहीं है।
यह बोध होने पर एक गहरा प्रश्न शेष रहता है: “यदि अज्ञान भी ‘मुझसे’ भिन्न है और मैं उसे मात्र एक साक्षी की तरह देख रहा हूँ, तो वास्तव में ‘मैं’ कौन हूँ?”



