ब्रह्मज्ञान — ज्ञानमार्ग
(गुरुदेव तरुण प्रधान जी को समर्पित )
१. अनुभवक्रिया
परिभाषा
अस्तित्व का प्रकट रूप अनुभव है।
अप्रकट रूप में वही अस्तित्व अनुभवकर्ता है।
अनुभव और अनुभवकर्ता — अस्तित्व के दो आयाम हैं।
विस्तार
सम्पूर्ण अस्तित्व अभी सामने अनुभव रूप में है — जगत, शरीर, मन, चित्त, सूक्ष्म–सूक्ष्म अनुभव।
अप्रकट रूप में वही अस्तित्व अनुभवकर्ता है — जिसे यह सब अनुभव होता है।
जहाँ अनुभव है, वहाँ अनुभवकर्ता स्वयं उपस्थित है — दोनों का अलग अस्तित्व नहीं।
अनुभव और अनुभवकर्ता — अस्तित्व का एक ही निरंतर प्रवाह हैं।
जहाँ यह द्वैत मिट जाता है, वही अनुभवक्रिया कहलाती है।
विवेक
दो रूप दिखते हैं: अनुभव (प्रकट) और अनुभवकर्ता (अप्रकट) — पर दोनों एक ही सत्ता हैं।
इनका भेद केवल चित्त-वृत्ति से बनता है।
जब यह भेद गिर जाता है, तब केवल “होना” शेष रहता है।
निष्कर्ष
अनुभव और अनुभवकर्ता अलग नहीं — यह एक ही अस्तित्व की निरंतर क्रिया है। अनुभवक्रिया ही अस्तित्व है।
२. अस्तित्व के दो आयाम
परिभाषा
अस्तित्व को अनुभव और अनुभवकर्ता — दो आयामों में देखना समझ को सरल बनाता है।
विस्तार
एक ही सत्ता को दो रूपों में पहचानने से तत्त्व स्पष्ट होता है।
बुद्धि एक पक्ष को पकड़कर दूसरे को समझ सकती है।
दोनों रूप अस्तित्व के ही नाम हैं।
द्वैत केवल शिक्षण की दृष्टि से है।
विवेक
दो आयाम मानने से तत्त्वज्ञान सरल होता है, पर वास्तविकता में यह एक ही है।
तत्त्व सदैव अनुभवकर्ता की ओर इंगित करता है।
निष्कर्ष
अस्तित्व को दो भागों में देखना केवल ज्ञान की सुविधा है — सत्य में दोनों एक ही हैं।
३. दृश्य–दृष्टा विवेक
परिभाषा
अनुभव और अनुभवकर्ता — दो परस्पर अनन्य श्रेणियाँ हैं।
विस्तार
अनुभवकर्ता अनुभव नहीं हो सकता।
अनुभव कभी अनुभवकर्ता नहीं हो सकता।
यही सबसे आवश्यक विवेक है।
इसी से अन्वेषी भ्रम से बचता है।
विवेक
चित्त अनुभव को ही अनुभवकर्ता मान लेता है — यही मूल भ्रम है।
चित्र पर्दा नहीं हो सकता; पर्दा चित्र नहीं हो सकता।
यह बोध ही दृश्य–दृष्टा विवेक है।
निष्कर्ष
दृष्टा = अनुभवकर्ता।
दृश्य = अनुभव।
दोनों की अदला-बदली असंभव है — यही मूलज्ञान है।
४. अनुभव और मैं
परिभाषा
सभी अनुभव उसी “मैं” में घटित होते हैं, जिससे अनुभवकर्ता का ज्ञान होता है।
विस्तार
मेरा जगत, मेरा शरीर, मेरा मन — सभी अनुभव के क्षेत्र हैं।
सभी अनुभव “मैं” में ही प्रकट हैं।
पशु, मानव, लोक — सब अनुभव रूप ही हैं।
“मैं” इन सभी में व्यापक हूँ।
विवेक
अनुभव और अनुभवकर्ता — दोनों अस्तित्व हैं।
इसलिए दोनों मैं ही हूँ।
अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं, पर तत्त्व समान है।
निष्कर्ष
मैं अनुभव भी हूँ और अनुभवकर्ता भी — सब एक ही अस्तित्व।
५. अद्वैत
परिभाषा
अनुभव और अनुभवकर्ता का विलय — अद्वैत।
विस्तार
दोनों का पृथक अर्थ मिट जाता है।
यहाँ कोई विशेष अनुभव नहीं होता।
केवल अस्तित्व की एकता रहती है।
योग का अर्थ — अनुभव को स्वयं से पृथक न देखना।
विवेक
अद्वैत में द्वैत की सभी रचनाएँ अर्थहीन हो जाती हैं।
अनुभूति का कोई पृथक मूल्य नहीं रह जाता।
निष्कर्ष
अद्वैत = एकत्व का प्रत्यक्ष बोध।
जहाँ भेद नहीं — वही अद्वैत है।
६. अद्वैतावस्था
परिभाषा
चिन्तन से परे — “दो नहीं हैं” का सहज ज्ञान।
विस्तार
यह कोई अवस्था नहीं; यह चित्त के पार की स्थिति है।
यहाँ “एक” भी नहीं कहा जा सकता — केवल “दो नहीं” कहा जा सकता है।
अद्वैतावस्था सदैव उपस्थित है।
सभी अनुभव इसी की पृष्ठभूमि पर आते–जाते हैं।
विवेक
यह कोई विशेष अनुभव नहीं है।
यह सामान्य अनुभवों की तरह प्रकट नहीं होता।
यह केवल सहज उपस्थिति — होना मात्र है।
निष्कर्ष
अद्वैतावस्था सदैव थी, है और रहेगी — यही वास्तविक पृष्ठभूमि है।
७. अद्वैत का ज्ञान
परिभाषा
अद्वैत का ज्ञान नकारात्मक है — भेद का खंडन।
विस्तार
अद्वैत जाना नहीं जा सकता।
मिथ्या–भेद हटाने को ही अद्वैत–ज्ञान कहा जाता है।
दो माध्यम:
-
अपरोक्ष अनुभव
-
तर्क
आधार — आत्मज्ञान: अनुभवकर्ता ही तत्त्व है।
विवेक
ज्ञान अनुभव पर आधारित नहीं;
अनुभवकर्ता की दिशा में निश्चय ही अद्वैत का मार्ग है।
निष्कर्ष
अद्वैत का ज्ञान = भेद का लोप।
यही ब्रह्मज्ञान है।
८. अद्वैत — अपरोक्ष अनुभव
परिभाषा
प्रत्यक्ष बोध कि “जो है — वही एक है।”
विस्तार
अनुभवकर्ता ही तत्त्व है — मनुष्य नहीं।
दो रूप दिखते हैं, पर दोनों एक ही सत्ता हैं।
भेद चित्त-वृत्ति से उत्पन्न — स्वयं मिथ्या।
अनुभव और अनुभवकर्ता निरंतर, सन्निकट और स्थानहीन हैं।
भीतर–बाहर की सीमाएँ चित्त की कल्पना हैं।
वस्तु का अनुभव ही वस्तु है — अलग अस्तित्व नहीं।
सब कुछ अनन्त, निरंतर एक ही प्रवाह।
विवेक
अनुभव और अनुभवकर्ता में दूरी, सीमा, अंतराल — सब कल्पित हैं।
दोनों का एक-दूसरे में व्याप्त होना ही अद्वैत का संकेत है।
निष्कर्ष
सारा द्वैत चित्तजनित है; तत्त्व एक ही है — अनुभवक्रिया।
९. अद्वैत — तर्क
परिभाषा
द्वैत का तर्क द्वारा खंडन।
विस्तार
दो सत् नहीं हो सकते।
स्वतंत्र अनुभव और स्वतंत्र अनुभवकर्ता — असंभव।
दोनों अलग माने तो दो सत्य मानने पड़ेंगे।
जो परिवर्तनशील है — वह तत्त्व नहीं।
जो अपरिवर्तनीय है — वही अकेला तत्त्व है।
अस्तित्व = अनुभव + अनुभवकर्ता = एक ही सत्य।
तीसरी कोई श्रेणी संभव नहीं।
विवेक
अनुभव और अनुभवकर्ता का सहअस्तित्व उनकी एकता सिद्ध करता है।
भेद बुद्धि का कार्य है, अस्तित्व का नहीं।
निष्कर्ष
तर्क भी अपरिवर्तनीय तत्त्व की ओर ही ले जाता है — वही अद्वैत है।
१०. ज्ञानांत
परिभाषा
ज्ञान का पूर्ण अंत — जहाँ कुछ शेष नहीं।
विस्तार
इसके आगे कोई ज्ञान नहीं।
ब्रह्मज्ञान को भी ‘ज्ञान’ कहना अर्थहीन हो जाता है।
ज्ञान का अंत = आत्मज्ञान पर समाप्ति।
इसके बाद केवल अनुभवों का अनंत विस्तार है।
अंत में केवल मान्यताओं का अंत होता है।
विज्ञान (व्यावहारिक) — मिथ्या के क्षेत्र का ज्ञान।
तंत्र–शास्त्र — बुद्धि-मनोरंजन; तत्त्व ज्ञान नहीं।
यहाँ साधना, खोज, प्रश्न — सब समाप्त।
विवेक
ब्रह्मज्ञान कोई नया ज्ञान नहीं;
अज्ञान का पूर्ण क्षय है।
निष्कर्ष
यही ज्ञानमार्ग का अंत है — जहाँ जानने योग्य कुछ नहीं बचता।
अस्तित्व ही शेष रहता है।
समर्पण
यह लेख
गुरुदेव तरुण प्रधान जी
की वाणी और उनके तत्व-प्रकाश को
नम्रतापूर्वक समर्पित है।
उनकी दी हुई यह दृष्टि
अनगिनत साधकों के अज्ञान को भेदकर
उनके भीतर छिपे हुए सत्य को प्रकट करे।
यही मंगल भावना।
स्रोत: श्री तरुण प्रधान जी — ज्ञानमार्ग गुरु



