⭐ मनन–उत्तर (प्रश्न ५): अस्तित्व का तत्त्व क्या है?
परिभाषा
अस्तित्व का तत्त्व अनुभवकर्ता है।
जो कुछ भी प्रकट है → अनुभव है।
जिसे यह प्रकट हो रहा है → वही अनुभवकर्ता है।
अनुभव बदलता है;
अनुभवकर्ता नहीं बदलता।
अपरिवर्तनशील जो है — वही तत्त्व है।
विस्तार
१. तत्त्व वह है जो कभी बदलता नहीं।
जगत, शरीर, मन, विचार, भाव—सब बदलते हैं।
इसका अर्थ है कि ये सभी तत्त्व नहीं हैं; ये अनुभव हैं।
जो परिवर्तन को देख रहा है,
पर स्वयं परिवर्तन का विषय नहीं बनता—
वही तत्त्व है।
२. तत्त्व का कोई अनुभव नहीं किया जा सकता।
अनुभव = प्रकट रूप → परिवर्तनशील
तत्त्व = अप्रकट → अपरिवर्तनशील
क्योंकि अनुभव की जा सकने वाली हर वस्तु ज्ञेय है,
और ज्ञेय अनित्य है।
इसलिए तत्त्व ज्ञेय नहीं — केवल साक्षी है।
३. तत्त्व अनुभवकर्ता है—अलग नहीं, अस्तित्व का मूल आयाम।
अस्तित्व के दो रूप देखे जाते हैं:
-
अनुभव (प्रकट)
-
अनुभवकर्ता (अप्रकट)
पर दोनों का स्रोत एक ही है।
अस्तित्व का मूल, सार, केंद्र — अनुभवकर्ता है।
४. तत्त्व शून्य है, पर अभाव नहीं।
ज्ञानमार्ग शून्य को “कमी” नहीं कहता—
यह वह है जिसमें सब कुछ संभव है।
शून्य = बिना-गुण का स्वरूप
गुण = अनुभव का क्षेत्र
तत्त्व में गुण नहीं होते;
गुण अनुभव में प्रकट हैं।
५. तत्त्व केवल ‘होना’ है।
तत्त्व न विचार है, न अहंकार है, न कोई अवस्था।
यह सिर्फ— होना है।
सभी अनुभव इस ‘होने’ पर आते और जाते हैं।
यह स्वयं कहीं नहीं जाता।
निष्कर्ष
अस्तित्व का तत्त्व—
-
अनुभवकर्ता है
-
अपरिवर्तनशील है
-
अप्रकट है
-
शून्य है
-
सदा उपस्थित है
-
सब अनुभवों का साक्षी है
सभी रूप बदलते हैं—
पर जो नहीं बदलता, वही तत्त्व है।
इसलिए—
अस्तित्व का तत्त्व अनुभवकर्ता ही है।



