प्रश्न ५: अस्तित्व का तत्त्व क्या है?

Dec 5, 2025 | ज्ञानमार्ग — मनन प्रश्नोत्तर, मनन

⭐ मनन–उत्तर (प्रश्न ५): अस्तित्व का तत्त्व क्या है?

परिभाषा

अस्तित्व का तत्त्व अनुभवकर्ता है।

जो कुछ भी प्रकट है → अनुभव है।
जिसे यह प्रकट हो रहा है → वही अनुभवकर्ता है।

अनुभव बदलता है;
अनुभवकर्ता नहीं बदलता।

अपरिवर्तनशील जो है — वही तत्त्व है।


विस्तार

१. तत्त्व वह है जो कभी बदलता नहीं।

जगत, शरीर, मन, विचार, भाव—सब बदलते हैं।
इसका अर्थ है कि ये सभी तत्त्व नहीं हैं; ये अनुभव हैं।

जो परिवर्तन को देख रहा है,
पर स्वयं परिवर्तन का विषय नहीं बनता—
वही तत्त्व है।


२. तत्त्व का कोई अनुभव नहीं किया जा सकता।

अनुभव = प्रकट रूप → परिवर्तनशील
तत्त्व = अप्रकट → अपरिवर्तनशील

क्योंकि अनुभव की जा सकने वाली हर वस्तु ज्ञेय है,
और ज्ञेय अनित्य है।
इसलिए तत्त्व ज्ञेय नहीं — केवल साक्षी है।


३. तत्त्व अनुभवकर्ता है—अलग नहीं, अस्तित्व का मूल आयाम।

अस्तित्व के दो रूप देखे जाते हैं:

  • अनुभव (प्रकट)

  • अनुभवकर्ता (अप्रकट)

पर दोनों का स्रोत एक ही है।
अस्तित्व का मूल, सार, केंद्र — अनुभवकर्ता है।


४. तत्त्व शून्य है, पर अभाव नहीं।

ज्ञानमार्ग शून्य को “कमी” नहीं कहता—
यह वह है जिसमें सब कुछ संभव है।

शून्य = बिना-गुण का स्वरूप
गुण = अनुभव का क्षेत्र

तत्त्व में गुण नहीं होते;
गुण अनुभव में प्रकट हैं।


५. तत्त्व केवल ‘होना’ है।

तत्त्व न विचार है, न अहंकार है, न कोई अवस्था।
यह सिर्फ— होना है।

सभी अनुभव इस ‘होने’ पर आते और जाते हैं।
यह स्वयं कहीं नहीं जाता।


निष्कर्ष

अस्तित्व का तत्त्व—

  • अनुभवकर्ता है

  • अपरिवर्तनशील है

  • अप्रकट है

  • शून्य है

  • सदा उपस्थित है

  • सब अनुभवों का साक्षी है

सभी रूप बदलते हैं—
पर जो नहीं बदलता, वही तत्त्व है।

इसलिए—

अस्तित्व का तत्त्व अनुभवकर्ता ही है।

और जानें — सत्य की ओर अगला कदम रखें।

Nirvan Dham

निर्वाणधाम

आदिगुरु–तत्त्व की शांति, स्पष्टता और सतत मार्गदर्शक उपस्थिति। सभी साधकों हेतु निर्मल, सरल और स्पष्ट दिशा।

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