प्रश्न-१: ज्ञानमार्ग दुःख से मुक्ति कैसे दिलाता है?

Dec 5, 2025 | ज्ञानमार्ग — मनन प्रश्नोत्तर, मनन

मनन-उत्तर (प्रश्न १): ज्ञानमार्ग दुःख से मुक्ति कैसे दिलाता है?

ज्ञानमार्ग की दृष्टि से दुःख कोई वस्तु नहीं है;
यह केवल अनुभव है — और हर अनुभव की तरह अनित्य और परिवर्तनशील

दुःख का अनुभव होता है, जैसे सुख का होता है।
दोनों का स्वरूप बदलता रहता है।
पर जो नहीं बदलता — वह है अनुभवकर्ता, वह “मैं” जो इन सबका साक्षी है।

अनुभव बदलता है; अनुभवकर्ता नहीं।
यही दुःख-निवृत्ति का बीज है।


🔶 १. दुःख = अनुभव

ज्ञानमार्ग में अनुभव की स्पष्ट परिभाषा है—

जो भी प्रकट हो रहा है, वह अनुभव है।

सुख–दुःख दोनों अनुभव हैं।
अनुभव का स्वभाव आना और चले जाना है।
चूँकि अनुभव स्वयं परिवर्तनशील है,
इसे तत्त्व या सत्य नहीं कहा जा सकता।

दुःख तब उत्पन्न नहीं होता जब अनुभव आता है—
दुःख तब उत्पन्न होता है जब अहम् कहता है—

“यह मेरे साथ हो रहा है।”

यही दुख का जन्मस्थान है।


🔶 २. दुःख का कारण अनुभव नहीं — शरीर-मन से मिथ्या पहचना है

अनुभवकर्ता कभी दुखी नहीं होता।

दुखी होने वाला कौन है?

  • शरीर? वह जड़ है।

  • मन? वह स्वयं अनुभव का क्षेत्र है।

  • अनुभव? वह तो बदल रहा है।

तो दुखी कौन है?

केवल अहम्-वृत्ति, जो कहती है —
“मैं शरीर हूँ”, “मैं मन हूँ”, “मैं अनुभव हूँ।”

जब यह गलत पहचान टूटती है और यह स्पष्ट होता है—

“अनुभव होता है — पर मैं अनुभव नहीं हूँ।”

“दुःख दिख रहा है — पर दुखी कौन है?”

यहीं दुःख समाप्त हो जाता है।


🔶 ३. अनुभवकर्ता दुःख से अप्रभावित है

अनुभवकर्ता का स्वरूप ज्ञानमार्ग में अति स्पष्ट है—

  • वह परिवर्तनशील नहीं

  • वह स्वयं अनुभव नहीं हो सकता

  • वह अनुभवों का साक्षी है

  • और सुख-दुःख दोनों को देखता है

सुख और दुःख आते-जाते हैं।
पर अनुभवकर्ता अविचल है।

जब यह भेदज्ञान स्थिर हो जाता है—
दुःख केवल देखा जाने वाला अनुभव रह जाता है,
वह बोझ नहीं बनता।


🔶 ४. ज्ञानमार्ग दुःख को नहीं मिटाता — दुखी होने की मान्यता को मिटाता है

यह सबसे गहरा बिंदु है।

दुःख का अंत = “दुखी मैं” का अंत

अनुभव तो आते रहेंगे।
पर उनके साथ चिपकी गलत पहचान नहीं रहेगी।

यही है दुःख से पूर्ण मुक्ति।


🔶 ५. यह मुक्ति कैसे आती है? — “अज्ञान-नाश” से

ज्ञानमार्ग कोई नया सिद्धांत नहीं जोड़ता।
यह केवल यह दिखाता है कि दुःख अज्ञान का परिणाम है।

अज्ञान =
“मैं अनुभव हूँ”
“यह मेरे साथ हो रहा है”
“मैं सुख-दुःख के अधीन हूँ”

जब अनुभवकर्ता का ज्ञान होता है,
अज्ञान का आधार ही ढह जाता है।

और जहाँ अज्ञान नहीं — वहाँ दुःख टिक ही नहीं सकता।


🔶 ६. ज्ञानमार्ग के दो प्रमाण इस मुक्ति की पुष्टि करते हैं

आपने ठीक पकड़ा—

  1. अपरोक्ष अनुभव
    अपने ही अनुभव में देखना कि दुःख अनुभव है, मैं अनुभवकर्ता हूँ।

  2. तर्क
    जो बदलता है वह मैं नहीं हो सकता।
    दुःख बदलता है → इसलिए मैं नहीं हूँ।

इन दोनों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि
मेरी वास्तविक स्थिति दुःख-रहित है


🔶 ७. अंतिम निष्कर्ष (Manan Conclusion)

ज्ञानमार्ग दुःख से मुक्ति दिलाता है क्योंकि—

  • दुःख अनुभव है

  • अनुभव अनित्य है

  • “मैं” अनुभवकर्ता हूँ

  • अनुभवकर्ता दुःख से अप्रभावित है

  • दुःख का कारण “मैं शरीर/मन हूँ” की मिथ्या पहचान है

  • ज्ञान उस मिथ्या पहचान का नाश कर देता है

  • और शेष बचता है साक्षीभाव — पूर्ण, शांत, निर्भार

अतः—

**ज्ञान दुःख को नहीं हटाता;

अज्ञान का नाश होते ही सुख–दुःख दोनों अप्रासंगिक हो जाते हैं।**

यही पूर्ण मुक्ति है।

और जानें — सत्य की ओर अगला कदम रखें।

Nirvan Dham

निर्वाणधाम

आदिगुरु–तत्त्व की शांति, स्पष्टता और सतत मार्गदर्शक उपस्थिति। सभी साधकों हेतु निर्मल, सरल और स्पष्ट दिशा।

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