मूलज्ञान
मूलज्ञान यह कहता है कि अस्तित्व स्वयं को ही अपने मिथ्या रूपों के रूप में अनुभव कर रहा है।
अस्तित्व ही दृश्य है और अस्तित्व ही द्रष्टा है।
जो प्रकट है वही उसका साक्षी भी है।
स्वप्रद्रष्टा ही स्वप्र भी है।
यही मूलज्ञान है — इससे आगे कोई ज्ञान नहीं है।
जब दृश्य और दृष्टा का भेद समाप्त हो जाता है, तब ज्ञान अपनी पूर्णता तक पहुँचता है।
ज्ञान का अंत
ज्ञान का अंत तभी माना जाता है जब:
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जानने के लिए कुछ बचा न रहे,
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ज्ञाता और ज्ञेय की भिन्नता समाप्त हो जाए,
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अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही सिद्ध हो जाएँ।
इस अवस्था के बाद “अधिक ज्ञान” सम्भव नहीं है। यही अंतिम बिंदु है जहाँ ज्ञान स्थिर और पूर्ण होता है।
किसे यह कार्यक्रम करना चाहिए?
यह कार्यक्रम उन सभी साधकों और जिज्ञासुओं के लिए है जो:
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मूलज्ञान को समझना चाहते हैं,
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सत्य के अर्थ और प्रमाण की खोज में हैं,
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जानना चाहते हैं कि “अस्तित्व ही दृश्य और द्रष्टा है” — यह कैसे सत्य है।
यह कार्यक्रम उपयोगी है:
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साधक, खोजी, जिज्ञासु
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बन्धन का अनुभव करने वाले
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दुख से मुक्ति के इच्छुक
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मुमुक्षु
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दार्शनिक, ज्ञान-प्रेमी, विज्ञान-प्रेमी
जो मूलज्ञान को प्रमाण सहित जानना चाहते हैं, उनके लिए यह कार्यक्रम विशेष रूप से बनाया गया है।
अस्तित्व
अस्तित्व वह है जो सब कुछ है।
जो भी है — वही अस्तित्व है। इसमें शामिल हैं:
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जगत
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शरीर
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मन
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लोक और जीव
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भौतिक और पराभौतिक
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भूतकाल, वर्तमान, भविष्य
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अच्छा-बुरा, सुंदर-कुरूप
इन सबका अनुभव करने वाला भी अस्तित्व ही है।
अस्तित्व एक ही है, क्योंकि कई “संपूर्णताएँ” संभव नहीं हैं।
सभी संभावनाएँ — अनुभवों के रूप में — उसी में निहित हैं।
अनुभव
जो भी प्रकट है वही अनुभव है।
यह अस्तित्व का वह चेहरा है जो दिखाई देता है।
मुख्य बिंदु:
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अनुभव असंख्य प्रकारों में प्रकट होता है।
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अनुभव के माध्यम से ही पता चलता है कि “कुछ है”, अर्थात अस्तित्व है।
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अनुभव ज्ञान का कारण है।
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भूत, वर्तमान, भविष्य—हर काल में कुछ न कुछ अनुभव प्रकट रहता है।
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इसलिए अनुभव समयहीन और नित्य है।
अस्तित्व की प्रकृति में अनंत संभावनाएँ हैं; इसलिए हर प्रकार का अनुभव संभव है।
अनुभवकर्ता
अनुभवकर्ता वह है जिसे सभी अनुभव होते हैं।
यह स्वयं कोई अनुभव नहीं है, इसलिए अप्रकट है।
मुख्य बिंदु:
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सभी अनुभव अनुभवकर्ता में ही घटित होते हैं।
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अनुभव बिना अनुभवकर्ता के ज्ञात नहीं हो सकता।
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अनुभवकर्ता को अनुभव नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह अनुभवों की श्रेणी में नहीं आता।
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वही आधार है जिस पर सभी अनुभव प्रकट होते हैं।
मूलज्ञान कहता है — अनुभव ही अनुभवकर्ता है।
दोनों एक ही हैं, और यही एकत्व अस्तित्व कहलाता है।
ज्ञानमार्ग
ज्ञानमार्ग वह विधि है जिसके द्वारा:
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अज्ञान का नाश होता है,
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मूलज्ञान प्रकट होता है,
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अनुभव, अनुभवकर्ता और अस्तित्व का स्वरूप प्रमाणित किया जाता है।
ज्ञान सदा विद्यमान है; दिखाई न देने का कारण केवल अज्ञान है।
ज्ञानमार्ग में उसी अज्ञान को हटाया जाता है।
यह सीधा मार्ग है और सत्य का निरीक्षण-आधारित अध्ययन है।
आगे क्या है?
आगामी चरणों में साधक निम्न विषयों को जानेंगे:
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ज्ञानमार्ग का परिचय
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मूलज्ञान का प्रमाण
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माया और विज्ञान
पहले यह जाना जाएगा कि:
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ज्ञान क्या है
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अज्ञान क्या है
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सत्य क्या है
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मिथ्या क्या है
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प्रमाण क्या है
इसके बाद मूलज्ञान को प्रमाण सहित समझा जाएगा।
फिर जो भी प्रकट है, उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाएगा।
निष्कर्ष
मूलज्ञान, अस्तित्व, अनुभव, अनुभवकर्ता और ज्ञानमार्ग—ये सभी तत्व मिलकर उस सत्य को प्रकट करते हैं जिसमें अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही हैं।
यह कार्यक्रम साधक को उसी सत्य की ओर ले जाने के लिए बनाया गया है।



