by आदिसत्व | Apr 2, 2026 | आदिसत्व
प्रस्तावना क्या आपने कभी महसूस किया है कि जीवन एक अंतहीन चक्रव्यूह है? हम अक्सर स्वयं को जिम्मेदारियों, रिश्तों और भविष्य की चिंताओं के ‘बंधन’ में जकड़ा हुआ पाते हैं। हम जिस संसार को इतना ठोस और वास्तविक मानकर इसमें सुधार करने की कोशिश करते हैं, प्राचीन...
by आदिसत्व | Apr 2, 2026 | आदिसत्व
प्रस्तावना: मुक्त चेतना का वह रहस्यमयी ‘लौटना’ आध्यात्मिक यात्रा में अक्सर एक गहन प्रश्न जिज्ञासुओं को झकझोरता है: यदि गुरु पूर्णतः मुक्त, ज्ञानी और माया के बंधनों से परे है, तो वह बार-बार इस द्वैत रूपी संसार में क्यों लौटता है? क्या शिष्यों के कल्याण का...
by आदिसत्व | Apr 2, 2026 | आदिसत्व
प्रस्तावना: पहचान का मानवीय संकट (The Human Dilemma of Identity) मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना उसकी पहचान की खोज है। जब एक नवजात शिशु इस धरा पर आता है, तब वह पूर्णतः कोरा और निर्दोष होता है। उसके लिए जगत केवल आकृतियों और संवेदनाओं का एक ‘विस्मय बोध’...
by आदिसत्व | Apr 1, 2026 | आदिसत्व
अक्सर सुबह जब हमारी नींद खुलती है, तो हम कहते हैं कि ‘इंजन शुरू होने’ में थोड़ा समय लगेगा। धीरे-धीरे चेतना लौटती है, स्मृतियाँ सक्रिय होती हैं और हम अपनी पहचान के साथ जुड़कर दैनिक कार्यों में जुट जाते हैं। लेकिन एक आध्यात्मिक चिंतक की दृष्टि से देखें, तो...
by आदिसत्व | Apr 1, 2026 | आदिसत्व
अक्सर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले साधकों के सामने एक बड़ा विरोधाभास खड़ा होता है: यदि सत्य अद्वैत है, तो फिर यह जीव बार-बार द्वैत के प्रपंच और सांसारिक उलझनों की दवा क्यों ढूंढता है? हम बड़ी-बड़ी दार्शनिक बातें करते हैं, अद्वैत की परिभाषाएं रट लेते हैं, लेकिन हमारा आचरण...