“मैं घर के बाहर देख नहीं पाता, तो सर्वव्याप्त कैसे हुआ?” : अज्ञान के सार को समझने की एक गहरी यात्रा

इस चर्चा को सुनने हेतु यहाँ क्लिक करें।  1. प्रस्तावना: अज्ञान की पहेली अध्यात्म की डगर पर चलते हुए हम अक्सर यह सुनते हैं कि हमारी वास्तविक प्रकृति अनंत, असीम और सर्वव्यापी है। उपनिषदों का उद्घोष है—”तत्त्वमसि”, यानी तुम वही (ब्रह्म) हो। लेकिन एक जिज्ञासु...

क्या आत्मबोध के बिना आनंद संभव है? अज्ञान के नाश से परम शांति तक के 5 गहरे सत्य

आज के समय में जब हम शांति की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा अर्थ किसी बाहरी परिस्थिति के अनुकूल होने से होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि क्या स्वयं को जाने बिना—अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने बिना—स्थायी आनंद संभव है? ‘निर्वाण धाम’ की हालिया...

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